पर्यावरण प्रदूषण के कारण और उपाय- Causes And Remedies of Environmental Pollution (in Hindi)

मनुष्य ही क्या प्रत्येक प्राणि एवं वनस्पति जगत भी पर्यावरण से घनिष्ट रूप से सम्बन्ध है। तथा ये सभी अपने पर्यावरण से प्रभावित भी होते है।   पर्यावरण की अवधरणा को स्पष्ट करने से पूर्व ‘पर्यावरण’ के शाब्दिक अर्थ को स्पष्ट करना आवश्यक है। पर्यावरण शब्द दो शब्दों अर्थात ‘परी’ तथा आवरण के संयोग या मेल से बना है। ‘परी’ का अर्थ है। ‘चारो ओर’ तथा आवरण का अर्थ है। ‘घेरा’ इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुवा ‘चारो ओर घेरा’ इस प्रकार व्यक्ति के सन्दर्भ में कहा जा सकता है। कि व्यक्ति के चारो और जो प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियां और परिस्थितियाँ विद्ममान है, इनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है। पर्यावरण का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। पर्यावरण इन समस्त शक्तियो, वस्तुओ और दशाओं का योग है, जो मानव को चारों और से आवृत किये हुए है। मानव से लेकर वनस्पति तथा सुक्षम जीव तक सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग है। पर्यावरण उन सभी बाहा दशाओं एवं प्रभावों का योग है जो के कार्य-कलापों एवं जीवन का प्रभावित करता है। मानव-जीवन पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बन्ध है।

इस लेख में पर्यावरण प्रदूषण वायु-प्रदूषण जल-प्रदूषण ध्वनि-प्रदूषण कारण नियंत्रण और उपाय के बारे में बताया गया है।

पर्यावरण का वर्गीकरण (Classification of Environment)

पर्यावरण के अर्थ एवं परिभाषा सम्बन्धी विवरण के आधार पर कहा जा सकता है। कि पर्यावरण की धारणा अपने आप में एक विस्तृत अवधारणा है। इस स्थिति में पर्यावरण के व्यवस्थित अध्ययन के लिए पर्यावरण का समुचित वर्गीकरण प्रस्तुत करना आवश्यक है। सम्पूर्ण पर्यावरण को मुख्य रूप से निम्न तीन वर्गों में बाटा जा सकता है।

प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण- प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण के अंतगर्त समस्त प्राकृतिक शक्तियों एवं कारकों को सम्मिलित किया जाता है। पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, वनस्पति जगत तथा जीव जंतु तो प्राकृतिक पर्यावरण के घटक ही है। इनके अतिरिक्त प्राकृतिक शक्तियों एवं घटनाओं को भी प्राकृतिक पर्यावरण ही माना जाएगा। सामान्य रूप से कहा जा सकता है। कि प्राकृतिक पर्यावरण न तो मनुष्य द्वारा निर्मित है। और न ही मनुष्य द्वारा नियन्त्रित ही है। प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का प्रभाव मनुष्य के जीवन के सभी पक्षों पर पड़ता है।

सामाजिक पर्यावरण- सामाजिक पर्यावरण  भी पर्यावरण का एक रूप या पक्ष है। सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचा ही सामाजिक पर्यावरण कहलाता है। इसे सामाजिक सम्बन्धो का पर्यावरण भी कहा जा सकता है। परिवार, पड़ोस, खेल के साथी, समाज, समुदाय, स्कूल आदि सभी सामाजिक पर्यावरण के ही घटक है। सामाजिक पर्यावरण भी व्यक्ति को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, लेकिन यह सत्य है। कि व्यक्ति सामाजिक पर्यावरण के निर्माण एवं विकाश में अपना योगदान प्रदान करता है।

सांस्कृतिक पर्यावरण- पर्यावरण का एक रूप या पक्ष सांस्कृतिक पर्यावरण भी है। सांस्कृतिक पर्यावरण प्रकृति-प्रदत्त नहीं है, बल्कि इसका निर्माण स्वयं मनुष्य ने ही किया है। वास्तव में मनुष्य द्वारा निर्मित वस्तुओ का समग्र रूप तथा परिवेश सांस्कृतिक पर्यावरण कहलाता है। सांस्कृतिक पर्यावरण भौतिक तथा अभौतिक दो प्रकार का होता है। सभी प्रकार के मानव निर्मित उपकरण एवं साधन सांस्कृतिक पर्यावरण के भौतिक पक्ष में सम्मिलित है। इससे भिन्न मनुष्य द्वारा विकसित किए गए मूल्यों, संस्कृति, धर्म, भाषा, रुढ़िया, परम्पराएँ आदि सम्मिलितरूप से सांस्कृतिक पर्यावरण के अभौतिक पक्ष का निर्माण करते है।

पर्यावरण का जनजीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव (Direct Impact of Enviroment On Life)

पर्यावरण जनजीवन के सभी पक्षों को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। पर्यावरण के जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को सामान्य रूप से दो वर्गो में बाटा जाता है। पहला  वर्ग में जनजीवन पर पर्यावरण के प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है, तथा दूसरा वर्ग में जनजीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है। पर्यावरण के जनजीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ने वाले प्रभावों को संक्षिप्त विवरण निम्न है।

पर्यावरण का जनसख्या पर प्रभाव- किसी भी क्षेत्र की जनसख्या के स्वरूप के निर्धारण में वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण की सर्वाधिक भूमिका होती है। अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने पर संबन्धित क्षेत्र की जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है। तथा प्रतिकूल प्राकृतिक पर्यावरण होने की स्थिति में संबन्धित क्षेत्र की जनसंख्या घनत्व कम होता है। यही कारण है कि उपजाऊ भूमि वाले मैदानी क्षेत्रों में जनसख्या का घनत्व कम होता है। स्पष्ट है कि पर्यावरण जनसख्या के घनत्व को प्रभावित करता है।

पर्यावरण का खान-पान पर प्रभाव- मनुष्य को अपनी खाद्य-सामग्री अपने पर्यावरण से ही प्राप्त होती है। इस स्थिति में जिस क्षेत्र में जो खाद्य-सामग्री बहुतायत में उपलब्ध होती है। वही उस क्षेत्र के निवासियों का मुख्य आहार होती है। उदाहरण के लिए उपजाऊ  मैदानी क्षेत्रों में लोगो का मुख्य आहार वहाँ उगने वाले अनाज तथा सब्जियां एवं दाले आदि ही होते है। इससे भिन्न समुद्रीतटीय क्षेत्रों में लोग अपने आहर में मछली एवं जलीय जीवो के मांस को अधिक स्थान देते है। इसी प्रकार ठण्डे एवं अति ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले अधिकाँश व्यक्ति मांसाहारी होते है,जबकि गर्म क्षेत्रों के अधिकाँश निवासी शाकाहारी होते है।

पर्यावरण का वेशभुषा पर प्रभाव- प्राकृतिक पर्यावरण का वहाँ के निवासियों की वेशभूषा पर भी प्रायप्त प्रभाव पड़ता है गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति बारीक़ ढीले तथा सूती वस्त्र धारण करते है। इसमें भिन्न ठण्डे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति गर्म चुस्त वस्त्र धारण किया करते है। अनेक ठण्डे प्रदेशो में जानवरों की खाल से भी कोट इत्यादि बनाकर पहने जाते है।

पर्यावरण का आवासीय स्वरूप पर प्रभाव- प्राकृतिक पर्यावरण मनुष्य के निवास हेतु प्रयुक्त मकानों तथा इनकी सामग्री को भी प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए पर्वतीय पर्यावरण में पत्थर तथा लकड़ी सरलता से उपलब्ध होती है। अतः इन क्षेत्रों में माकन बनाने के लिए पत्थर तथा लकड़ी को ही अधिक इस्तेमाल किया जाता है।

जिन क्षेत्रों में वर्षा अधिक होती है। वहाँ मकानों की छत ढलावदार बनाई जाती है। मैदानी क्षेत्रों में प्रायः ईट, सीमेंट एवं लोहे आदि से माकन बनाये जाते है। कुछ क्षेत्रों में प्रायः भूचाल आया करते है। इन क्षेत्रों में अधिक क्षति से बचने के दृष्टिकोण से लकड़ी के मकान ही बनाए जाते है। इस प्रकार स्पष्ट है। कि पर्यावरण जन सामान्य के आवासीय स्वरूप को भी प्रभावित करता है।

पर्यावरण का आवागमन के साधनों पर प्रभाव- प्राकृतिक अथवा भौगोलिक पर्यावरण का आवागमन के साधनों के विकास पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। समुद्र तथा नदियों के पास वाले क्षेत्रों में स्टीमर एवं नौकाए आवागमन का साधन होती है। मैदानी क्षेत्रों में सड़के बनाना तथा रेल की पटरियां विछाना सरल होता है। अतः इन क्षेत्रों में रेलगाड़िया, मोटर कारे, बसे आदि वाहन अधिक होते है। ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में खच्चर ही आवागमन एवं मॉल ढोने के साधन माने जाते है।

पर्यावरण पर शारीरिक लक्षणो पर प्रभाव- जन-सामान्य के शारीरिक लक्षणोपर भी भौगोलिक पर्यावरण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की त्वचा के रंग पर जलवायु एवं स्थानीय तापमान का अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। ग्राम क्षेत्रों में रहने वालो का रंग बहुधा काला तथा ठण्डे क्षेत्रों में रहने वालो का रंग गोरा होता है। भूमध्य रेखीय जलवायु में रहने वाले व्यक्ति वहाँ की अतिरिक्त उष्णता के कारण नाटे कद के और काले रंग होते है। जब की भूमध्य सागरीय जलवायु के निवासी प्रायः गोरे तथा लम्बे कद के होते है।

पर्यावरण का व्यावसायिक जीवन पर प्रभाव- प्राकृतिक पर्यावरण सम्बन्धित क्षेत्र के निवासियों के मूल व्यवसायो को भी प्रभावित करता है। यह सर्वविदित तथ्य है की समुद्र एवं जल स्त्रोतों के निकट रहने वाले लोगो का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना होता है। नदियों से सिंचित मैदानी क्षेत्रों में कृषि-कार्य ही मुख्य व्यवसाय माना जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है। कि पर्यावरण अनिवार्य रूप से व्यावसायिक जीवन को भी प्रभावित करता है।

पर्यावरण प्रदूषण का अर्थ (Meaning of Environmental Pollution)

पर्यावरण प्रदूषण का सामान्य अर्थ है हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्ही तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है। तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।

उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाए तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। वायु के अतिरिक्त पर्यावरण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण प्रदूषण ही कहा जाएगा। यह प्रदूषण, जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण के रूप में हो सकता है। प्रदूषण के विभिन्न रूपों का संक्षिप्त विवरण निम्न है।

पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार (Typesof Environmental Pollution)

वायु-प्रदूषण- वायु प्रदूषण वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसे एक विशिष्ट अनुपात में प्रकृति द्वारा प्रदत्त है। जब इन गैसों का प्राकृतिक अनुपात बिगड़ जाता है। तब हम कह सकते है। कि वायु प्रदूषित हो गयी है। की स्थिति यह भी हो सकती है। कि हमारे वायु मण्डल में ऐसे कण अधिक व्याप्त हो जाए जो स्वास्थ पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है। ये कण औद्दोगिक सस्थानों से विसर्जित होने वाले रासायनिक पदार्थो के भी हो सकते है। वायु-प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से औद्दोगिक-संस्थान ही जिम्मेदार है | औद्दोगिक सस्थानों में प्रायः दहन की प्रक्रिया किसी न किसी रूप में अवश्य होती है।

इस दहन के परिणामस्वरूप जो धुआँ बनता है उसमें सम्बन्धित ईंधन एवं इस्तेमाल होने वाले पदार्थो के व्यर्थ भाग विद्ममान होते है। उद्दोगों की चिमनियों से निकलने वाली व्यर्थ गैसों वायु-प्रवाह के साथ वायु मण्डल में मिल जाती है। इसमें विभिन्न गैसों के साथ-साथ कुछ धातुओं के हानिकारक कण भी होते है, जैसे सीसा, एस्बेस्टस, आसेर्निक, क्लोराइड, बेरियम आदि धीमी गति से होने वाले निर्माण कार्यो के परिणामस्वरूप भी वायु मण्डल निरंतर प्रदूषित होता रहता है।

उदाहरण के लिए- विभिन्न अम्लों जैसे कि सल्फ्यूरिक,नाइट्रिक अथवा हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के निर्माण से वायु प्रदूषित होती रहती है। संक्षेप में कहा जा सकता है की औद्दोगिक उत्पादनो के परिणामस्वरूप हमारे वायु मण्डल में हाइड्रोजन सल्फाइड, सल्फर डाइ-ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, क्लोराइड व धूल, धात्विक पदार्थ तथा हाइड्रोकार्बन व्याप्त होते रहते है। तथा वायु-प्रदूषित होती रहती है।

औद्दोगिक अवशेषों के अतिरिक्त नगरीय क्षेत्रों में वायु-प्रदूषण के दूसरे मुख्य कारक वाहन है। नगरों में असख्य वाहन सड़को पर चलते है। इन वाहनों में पेट्रोल,डीजल या कोयला ईंधन के रूप में इस्तेमाल होता है। ये वाहन भी निरन्तर रूप से धुआँ छोड़ते रहते है। जो वायु को प्रदूषित करता रहता है। इसके अतिरिक्त नगरों में स्थान-स्थान पर लगे कूड़े-करकट के ढेर व मरे पशुओ के शवों से उठने वाली बदबूदार हवा भी वायु को प्रदूषित करती है।

इन कारणों के अतिरिक्त फसलों को कीड़ो एवं बीमारियों से बचने के लिए अनेक प्रकार की कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव वायुयान से भी किया जाता है। इसमें भी वायु प्रदूषित होती रहती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि वायु को प्रदूषित करने के उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त कभी-कभी कुछ आकस्मिक घटनाए भी गम्भीर प्रदूषण का कारण बन जाती है।

उदाहरण के लिए- भोपाल में होने वाली गैस-रिसाव की घटना इसी प्रकार की एक आकस्मिक घटना थी जिसके परिणामस्वरूप हुई प्रदूषित वायु ने कुछ ही घण्टो में हजारो व्यक्तियों को मार दिया तथा अन्य हजारो को उम्र भर के लिए रोगी या अपाहिज बना दिया इस प्रकार की छोटी-बड़ी घटनाएँ समय-समय पर नगरों में होती रहती है।

अब प्रश्न उठता है। कि वायु-प्रदूषण का क्या प्रभाव पड़ता है। वास्तव में वायु-प्रदूषण का गंभीर प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यो एवं अन्य प्राणियों के स्वास्थ पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त जलवायु,मौसम तथा वनस्पतियों पर भी वायु-प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ता है। जहाँ तक मुनष्यों का प्रश्न है वायु-प्रदूषक पदार्थो के कारण अनगिनत रोग होने की अनिरन्तर आशंका रहती है।

जिनमे फेफड़ो के रोग मुख्य है नगरीय वातावरण में आज सर, दर्द, आँखे, दुखना, चिरमिराहट होना आदि साधारण परेशानियाँ है। औद्दोगिक नगरों में खासी, दमा ब्रांकाइटिस, गले के रोग, निमोनिया, चक्कर आना,आँखे लाल हो जाना, ह्रदय रोग, हड्डियो के दर्द आदि रोगो की दर दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है। इनका मुख्य कारण वायु का प्रदूषित होना ही है। निरन्तर अधिक समय तक प्रदूषित वायु के सेवन के परिणामस्वरूप कैंसर तक हो सकता है। धूल से तरह-तरह की गैसे तथा नमी मिलकर जो धूम-धुंध बनाती है वे भी स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक होती है।

जलप्रदूषण- जल के मुख्य रूपों से दूषित और विषैले पदार्थों के तत्वों के समावेश होने से जल-प्रदूषण कहलाता है। जल-प्रदूषण भी एक गंभीर नगरीय समस्या है। जल-प्रदूषण का बुरा प्रभाव मानव समाज प्राणी जगत तथा वनस्पति जगत सभी पर प्रभाव पड़ता है। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूप अमेरिका की विशाल ईरी झील लगभग निर्जीव हो चली है। और फ्रांस की चमचमाती, खूबसूरती नदी ईरान भी अब एक बहुत गंदा नाला और दुर्गति का बहता भंडार बन गई है। भारत में भी बरौनी तेल शोधक,कारखाने के कारण गंगा के शीतल जल से उठती अग्नि की प्रचंड लपटों के भयंकर तांडव नृत्य को लोग अभी  भूले नहीं है।

दिल्ली व आगरा के बीच पुण्य सलिला यमुना का गंगा भी विश्व बनता जा रहा है। गोमती वा गोदावरी की भी यही कहानी है नदी तालाबों के अतिरिक्त समुद्र का जल भी बहुत अधिक प्रदूषित हो चुका है यही नहीं औद्दोगिक नगरों में होने वाली वर्षा का जल भी वायुमण्डल की अशुद्धियों  के कारण प्रदूषित होता अब प्रश्न उठता है। कि जल-प्रदूषण के मुख्य कारण क्या है।

सर्वप्रथम घरेलू व्यर्थ पदार्थ तथा वाहित मल आदि बहकर कहीं न कहीं किसी न किसी जल स्रोत में अवश्य मिलते हैं।सभी संभव सावधानियां रखने पर भी इससे जल प्रदूषण अवश्य होता है। जल को प्रदूषित करने में सभी औद्दोगिक संस्थान भी बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। सभी प्रकार के उद्दोगो से अनेक प्रकार के व्यर्थ पदार्थ निकलते हैं। जो किसी न किसी रूप में जल में मिलकर जल के मुख्य स्रोत तक पहुंच जाते हैं कागज की लुगदी, वस्त्र,चीनी, वनस्पति, घी, पेट्रोल, रसायन, शराब चमड़ा कीटनाशक दवाइयां आदि बनाने में जो व्यर्थ पदार्थ बसते हैं।

वह बेहतर आसपास के क्षेत्र तथा जल के मुख्य स्रोत को दूषित करते हैं। नगरों के निकट बहने वाली नदियों में नगरों का कूड़ा-करकट कर मिल जाता है|पर सभी जल को मल मूत्र त्याग कर दूषित करते रहते हैं। अनेक स्थानों पर मनुष्य एवं पशुओं के शव को भी नदियों में बहाया जाता है जल स्रोत के पास ही कपड़े धोने एवं उनकी रंगाईया ब्लीचिंग का भी कार्य बड़े स्रोत पर हुआ करता है इससे भी जल प्रदूषित होता है।

बड़े-बड़े औद्योगिक नगरों के निकट के जल स्रोतों को दूषित करने में रेडियोएक्टिव पदार्थ तथा धात्विक पदार्थ भी बहुत योगदान देते हैं। तेल पदार्थों के जल में मिलने से भी जल प्रदूषण होता है| पर्यावरण में ताप के बढ़ जाने के कारण भी जल प्रदूषण हो रहा है। जल प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष (500000) से अधिक बच्चे दूषित पानी द्वारा उत्पन्न बीमारियों से मर जाते हैं।

ऐसा अनुमान है। कि बीमारी होने वाले लोगों में 50% लोग केवल दूषित जल के सेवन के ही कारण बीमार होते हैं। प्रदूषित जल के सेवन से मुख्य रूप से पाचन तंत्र संबंधित रोग उत्पन्न होते हैं। इन लोगों में मुख्य हैजा, पीलिया, टाइफाइड, पैराटायफाइड आदि यह सभी रोग संक्रामक रोग से फैलते हैं। तथा घातक सिद्ध होते हैं। प्रदूषित जल एक अन्य प्रकार से भी मनुष्य को प्रभावित करता है|हम जानते हैं कि आप लोग मांसाहारी हैं। तथा मांस प्राप्त का मुख्य स्रोत मछलियां एवं अन्य जल जीव हैं। जल प्रदूषित हो जाता है।

तब इन मछलियों के शरीर में अनेक हानिकारक तत्वों का समावेश हो जाता है। तथा ऐसे जीवो का मांस खाने से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है|ऐसा देखा गया है कि विभिन्न रसायनों से प्रदूषित समुद्री जल में रहने वाली मछलियों के मांस को खाने से अंधेपन एवं संबंधित रोग की आशंका रहती है। इसी तत्व को ध्यान में रखते हुए कनाडा में 10  झीलों से मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

ध्वनि-प्रदूषण- पर्यावरण प्रदूषण का एक रूप ध्वनि प्रदूषण भी है। ध्वनि-प्रदूषण की समस्या भी नगरों में अधिक है। ध्वनि-प्रदूषण को साधारण शब्दों में शोर बढ़ने के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है। पर्यावरण में शोर अर्थात ध्वनियों का बढ़ जाना ही ध्वनि-प्रदूषण है। अब प्रश्न उठता है कि शोर क्या है। वास्तव में प्रत्येक अनचाही आवाज शोर है। तेज आवाज से चलते रेडियो, लाउडस्पीकरों पर बसते फिल्मी गाने हमारी मांगे पूरी करो और जिंदाबाद के नारे शोर ही है। कारों-बसों आदि वाहनों के हार्न रेलगाड़ियों के चलने की आवाज व जेट विमान की आवाज भी शोर है।

यही नहीं किसी कार्यालय में टाइपराइटर की निरंतर खटखट, टेलीफोन की टनटनाती घण्टिया, चपरासी को बुलाने की घण्टिया घड़ियों की टिक-टिक तथा जेनरेटर की घर्र-घर्र भी शोर ही है। कारखानों की मशीनों की खट-खट, भड़-भड़ व तेज़ी से बजने वाले सायरन भी शोर के मुख्य स्रोत हैं। यही नहीं, सड़कों पर होने वाले लड़ाई- झगड़े चीख-पुकार स्कूलों में बच्चों की बातें आदि भी शोर का रूप है। घरों में पटक-पटक कर कपड़े धोने व बर्तन उठाने-पटकने से भी शोर उत्पन्न होता है संक्षेप में कहा जा सकता है| कि नगरों में ध्वनि-प्रदूषण असंख्य स्रोत तथा दिन- पर-दिन ध्वनि-प्रदूषण गंभीर समस्या का रूप धारण कर रहा है।

ध्वनि-प्रदूषण का गंभीर एवं घातक प्रभाव पड़ रहा है। 1 दिन ऐसा आएगा जब मनुष्य को स्वास्थ्य के सबसे बुरे शत्रु के रूप में क्रूर शोर से संघर्ष करना पड़ेगा। ऑस्ट्रिया के शोर आदमी को समय से पहले बूढ़ा कर देता है| वास्तव में शोर मानव। शरीर पर विविध प्रकार से प्रभाव डालता है| शोर से मनुष्य के स्वास्थ्य कमजोर होता है तथा उसकी कार्यक्षमता भी निरंतर घटती है| शोर से अनेक दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं।

गर्भवती स्त्रियों तथा छोटे बच्चों पर भी शोर का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। शोर से व्यक्ति बहरा हो सकता है। शोर धन-प्रदूषण का सर्वाधिक बुरा प्रभाव कारखानों एवं औद्दोगिक संस्थानों में काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ता है। इन श्रमिकों के कानों के अतिरिक्त हृदय, केंद्रीय तंत्रिका-तंत्र तथा पाचन-तंत्र पर भी शोध का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। शोर के कारण रक्तचाप, श्वसन गति, नाड़ी गति में उतार-चढ़ाव जठरांत्र गतिशीलता में कमी, रूद्र परिसंचरण में परिवर्तन तथा हृदय-पेशी के गुणों में भी परिवर्तन हो जाता है। शोर से शारीरिक तनाव बढ़ता है। अत्याधिक शोर से निस्टेगमस हो जाता है। तथा चक्कर आने लगता है।

वायु प्रदूषण के कारण (Due To Air Pollution)

वायु प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से औद्योगिक-संस्थान ही जिम्मेदार है। योगी संस्थानों में प्रायः दहन की प्रक्रिया किसी-न-किसी रूप में अवश्य होती है। इस दहन के परिणामस्वरूप जो धुआँ बनता है। उसमें संबंधित ईंधन एवं  इस्तेमाल होने वाले पदार्थों के व्यर्थ विद्ममान होते हैं। उद्योगों की चिमनीयों से निकलने वाली व्यर्थ गैस वायु प्रभाव के साथ वायुमंडल में मिल जाती है। इसमें विभिन्न गैसों के साथ-साथ कुछ धातुओं के हानिकारक का कारण भी होते हैं। जैसे शीशा, एस्बेस्टस, आर्सेनिक, क्लोराइड, बेरियम आदि। धीमी गति से होने वाले निर्माण कार्यों के परिणामस्वरूप भी वायु वायुमण्डल निरंतर प्रदूषित होता रहता है।

उदाहरण के लिए- विभिन्न अम्लों जैसे कि सल्फ्यूरिक, नाइट्रिक अथवा  हाइड्रोक्लोरिक अम्ल निर्माण से वायु प्रदूषण होती रहती है। संक्षेप में कहा जा सकता है। कि औद्योगिक उत्पादन ओं के परिणामस्वरूप हमारे वायुमंडल में हाइड्रोजन सल्फाइड सल्फर, डाइ-ऑक्साइड कार्बन मोनोऑक्साइड, क्लोराइड व धूल धात्विक पदार्थ तथा हाइड्रोकार्बन व्याप्त होते रहते हैं।

तथा वायु| प्रदूषित होती रहती है। औद्योगिक  अवशेषों के अतिरिक्त नगरीय क्षेत्रों में वायु-प्रदूषण के दूसरे मुख्य कारक वाहन है| नगरों में असंख्य वाहन सड़कों पर चलते हैं। इन वाहन वाहनों में पेट्रोल-डीजल या कोयला ईंधन के रूप में इस्तेमाल होता रहता है। यह वाहन भी निरंतर रूप से धुआं छोड़ते रहते हैं। जो वायु को प्रदूषित करता रहता है।

इसके अतिरिक्त नगरों में स्थान-स्थान पर लगे कूड़े-करकट के ढेर व मरे पशुओं के शवों से उठने वाली बदबू दार हवा वायु को प्रदूषित करती है। इन कारणों के अतिरिक्त फसलों को कीड़ों एवं बीमारियों से बचाने के लिए अनेक प्रकार की कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव वायुयान से भी किया जाता है। इससे भी वायु प्रदूषित होती रहती है। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि वायु को प्रदूषित करने के उपयुक्त कारणों के अतिरिक्त कभी-कभी कुछ आकस्मिक घटनाएं भी गंभीर प्रदूषण का कारण बन जाती है।

वायु प्रदूषण के नियंत्रण के मुख्य उपाय (Main Measures To Control Air Pollution)

वायु प्रदूषण को नियंत्रित रखने के लिए अति आवश्यक है। कि औद्योगिक स्थानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं को नियंत्रित किया जाए इसके लिए दो उपाय आवश्यक किए जाने चाहिए। प्रथम या की चिमनिया बहुत ऊंची होनी चाहिए ताकि उन से निकलने वाली दूषित गैसों काफी ऊंचाई पर वायुमंडल में मिले और पृथ्वी पर इनका अधिक प्रभाव ना पड़े।

दूसरा उपाय यह किया जाना चाहिए कि औद्योगिक संस्थानों की चिमनियों  में बहुत उत्तम प्रकार के छन्ने लगाए जाने चाहिए। इन छन्नो द्वारा व्यर्थ गैसों में से सभी प्रकार के कण छनकर भीतर ही रह जाएंगे, केवल गर्म हवा एवं कुछ गैस की वायुमंडल में निष्कासित हो पाएंगी इससे प्रदूषण नियंत्रित होगा इसके अतिरिक्त औद्योगिक संस्थनो के अंदर श्रमिकों को स्थानीय प्रदूषण से बचाने  के लिए सभी संभव उपाय किए जाने चाहिए।

इसके लिए सवातन  की सुव्यवस्था होनी चाहिए तथा ऑक्सीजन की कृत्रिम व्यवस्था भी अवश्य होनी चाहिए। औद्योगिक संस्थानों के विकेन्द्रीकरण से भी वायु-प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है। औद्योगिक  संस्थानों के अतिरिक्त वायु-प्रदूषण के मुख्य स्रोत वाहन हैं। इसके लिए भी कुछ कारगर उपाय करने होंगे। सर्वप्रथम या अनिवार्य है कि सड़क पर चलने वाला प्रत्येक वाहन बिल्कुल ठीक होना चाहिए। उसका कार्बोरेटर तथा धुआ निकलने वाला भाग भी बिल्कुल ठीक होना चाहिए।

इस स्थिति  में कम दुआ तथा कार्बन मोनो-ऑक्साइड निकलते हैं। इसके अतिरिक्त जहां तक संभव हो सके सड़कों सड़कों पर यातायात नहीं रोकना चाहिए। क्योंकि चलते हुए वाहन की अपेक्षा स्टार्ट स्थित में रुके वाहन अधिक प्रदूषण करते हैं। वाहनों के धुआं निकलने वाले पाइप के मुंह पर भी लिफ्टर लगवाए जाने चाहिए। पेट्रोल एवं डीजल में मिलावट को रोककर भी प्रदूषण को कम किया जा सकता है। रेलगाड़ियों का विद्युतीकरण करके भी काफी हद तक वायु प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है।

जल प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय (Measures To Control Water Pollution)

वायु प्रदूषण के ही समान जल-प्रदूषण के भी मुख्य स्त्रोत औद्योगिकसंस्थान ही है। जल-प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए भी औद्योगिक संस्थानों की गतिविधियां को नियंत्रित करना होगा। औद्योगिक संस्थानों में ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि कम-से-कम व्यर्थ पदार्थ बाहर निकले तथा निकलने वाले व्यर्थ पदार्थों एवं जल को उपचारित करके ही निकाला जाए।

इसके अतिरिक्त नगरीय कूड़े-करकट को भी जैसे-तैसे नष्ट कर देना चाहिए तथा जल-स्रोतों में मिलने से रोकना चाहिए जहां तक घरेलू जल-मल का प्रश्न है, इसकी भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए इससे गैस एवं खाद बनने की अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए।

ध्वनि प्रदूषण के नियंत्रण के उपाय (Measures To Control Noise Pollution)

ध्वनि-प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए भी विशेष उपाय किए जाने चाहिए जहां तक संभव हो वाहनों के हार्न अनावश्यक रूप से न बजाए जाएं। कल-कारखानों में जहां-जहां संभव हो मशीनों में साइलेंसर लगाए जाए सार्वजनिक रूप से लाउडस्पीकरों आदि के इस्तेमाल को नियंत्रित किया जाना चाहिए।

घरों में भी रेडियो, टीवी आदि की धुन को नियंत्रित रखा जाना चाहिए। औद्योगिक संस्थानों में छुट्टी आदि के लिए बजने वाले उच्च ध्वनि के सायरन न लगाए जाएं। इस उपयोग एवं सावधानियों को अपनाकर काफी हद तक ध्वनि प्रदूषण से बचा जा सकता है।

पर्यावरण प्रदूषण का व्यक्ति की कार्यक्षमता पर प्रभाव (Effect Of Environmental Pollution On Human Performance)

व्यक्ति एवं समाज की प्रगति में संबंधित व्यक्तियों की कार्य-क्षमता का विशेष महत्व होता है। यदि व्यक्ति की कार्य-क्षमता सामान्य या सामान्य से अधिक हो तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है। तथा समृध्द बन सकता है। जहां तक पर्यावरण-प्रदूषण का प्रश्न है। इसके परिणामस्वरुप व्यक्ति की कार्य-क्षमता अनिवार्य रूप से घटती है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरुप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति न  तो अपने कार्य को कुशलतापूर्वक ही कर सकता है और ना ही उत्पादन-क्षमता ही समान रह पाती  है।

ये दोनों ही स्थितियां व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती है। वास्तव में प्रदूषित वातावरण से भले ही व्यक्ति अस्वास्थ्य न  भी हो तो भी उसकी चुस्ती एवं स्फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारण व्यक्ति की कार्य-क्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त सिद्ध होता है।

पर्यावरण प्रदूषण का जन-स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effects Of Environmental Pollution On Public Health)

पर्यावरण प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन स्वास्थ्य पर पड़ता है। जैसे-जैसे पर्यावरण का अधिक प्रदूषण होने लगता है वैसे-वैसे प्रदूषण जनित रोगों की दर एवं गंभीरता से में वृद्धि होने लगती है। पर्यावरण के विभिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप श्वसन तंत्र से संबंधित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूप पाचन तंत्र से संबंधित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि-प्रदूषण भी तंत्रिका तंत्र हृदय एवं रक्तचाप संबंधी विकारों को जन्म देते हैं। इसके साथ-ही-साथ मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहारगत सामान्यता को भी ध्वनि-प्रदूषण विकृत कर देता है।

अन्य प्रकार के प्रदूषण भी जन-सामान्य को विभिन्न सम्मान एवं गंभीर रोगों का शिकार बनाते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है। कि पर्यावरण-प्रदूषण अनिवार्य रूप से जन-स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, प्रदूषित पर्यावरण में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आयु भी घटती है।तथा स्वास्थ्य का समान स्तर भी निम्न ही रहता है।

आर्थिक जीवन पर पर्यावरण प्रदूषण का प्रभाव (Effect Of Environmental Pollution On Economic Life)

व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर भी पर्यावरण-प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में यदि व्यक्ति का सम्मान स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्य-क्षमता भी कम हो तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की उत्पादन क्षमता घट जाती है। इसके साथ-ही-साथ यह भी सत्य है।

कि यदि व्यक्ति अथवा उसके परिवार का कोई सदस्य प्रदूषण का शिकार हो इन्हीं साधारण या गंभीर रोगों से ग्रसित रहता हो तो उसके उपचार पर भी पर्याप्त व्यय करना पड़ सकता है। इससे भी व्यक्ति एवं परिवार का आर्थिक बजट बिगड़ जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है, कि पर्यावरण-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में कुप्रभावित होती है। इस कारक के प्रबल तथा विस्तृत हो जाने पर समाज एवं राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है।

FAQ

Qus-वायु प्रदूषण का क्या कारण है?

Ans- वायु प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से औद्योगिक-संस्थान ही जिम्मेदार है | योगी संस्थानों में प्रायः दहन की प्रक्रिया किसी-न-किसी रूप में अवश्य होती है। इस दहन के परिणामस्वरूप जो धुआँ बनता है। उसमें संबंधित ईंधन एवं  इस्तेमाल होने वाले पदार्थों के व्यर्थ विद्ममान  होते हैं। उद्योगों की चिमनीयों से निकलने वाली व्यर्थ गैस वायु प्रभाव के साथ वायुमंडल में मिल जाती है। इसमें विभिन्न गैसों के साथ-साथ कुछ धातुओं के हानिकारक का कारण भी होते हैं। जैसे शीशा, एस्बेस्टस, आर्सेनिक , क्लोराइड, बेरियम आदि। धीमी गति से होने वाले निर्माण कार्यों के परिणामस्वरूप भी वायु वायुमण्डल निरंतर प्रदूषित होता रहता है।

Qus-वायु प्रदूषण को कैसे रोका जाए?

Ans- वायु प्रदूषण को नियंत्रित रखने के लिए अति आवश्यक है। कि औद्योगिक स्थानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं को नियंत्रित किया जाए इसके लिए दो उपाय आवश्यक किए जाने चाहिए। प्रथम या की चिमनिया बहुत ऊंची होनी चाहिए ताकि उन से निकलने वाली दूषित गैसों काफी ऊंचाई पर वायुमंडल में मिले और पृथ्वी पर इनका अधिक प्रभाव ना पड़े। दूसरा उपाय यह किया जाना चाहिए कि औद्योगिक संस्थानों की चिमनियों  में बहुत उत्तम प्रकार के छन्ने लगाए जाने चाहिए।

इन छन्नो द्वारा व्यर्थ गैसों में से सभी प्रकार के कण छनकर भीतर ही रह जाएंगे, केवल गर्म हवा एवं कुछ गैस की वायुमंडल में निष्कासित हो पाएंगी इससे प्रदूषण नियंत्रित होगा इसके अतिरिक्त औद्योगिक संस्थनो के अंदर श्रमिकों को स्थानीय प्रदूषण से बचाने  के लिए सभी संभव उपाय किए जाने चाहिए।

Qus-वायु प्रदूषण के प्रभाव क्या हैं?

Ans- वास्तव में वायु-प्रदूषण का गंभीर प्रतिकूल प्रभाव मनुष्यो एवं अन्य प्राणियों के स्वास्थ पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त जलवायु,मौसम तथा वनस्पतियों पर भी वायु-प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ता है। जहाँ तक मुनष्यों का प्रश्न है वायु-प्रदूषक पदार्थो के कारण अनगिनत रोग होने की अनिरन्तर आशंका रहती है,जिनमे फेफड़ो के रोग मुख्य है। नगरीय वातावरण में आज सर, दर्द, आँखे, दुखना, चिरमिराहट होना आदि साधारण परेशानियाँ है। औद्दोगिक नगरों में खासी,दमा ब्रांकाइटिस,गले के रोग, निमोनिया, चक्कर आना,आँखे लाल हो जाना,ह्रदय रोग,हड्डियो के दर्द आदि रोगो की दर दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है।

इनका मुख्य कारण वायु का प्रदूषित होना ही है। निरन्तर अधिक समय तक प्रदूषित वायु के सेवन के परिणामस्वरूप कैंसर तक हो सकता है। धूल से तरह-तरह की गैसे तथा नमी मिलकर जो धूम-धुंध बनाती है वे भी स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक होती है।

Qus-पर्यावरण प्रदूषण क्या है इसे रोकने के उपाय?

Ans-पर्यावरण प्रदूषण का सामान्य अर्थ है हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना | पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्ही तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगता है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है।

तब कहा जाता है कि पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाए तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। वायु के अतिरिक्त पर्यावरण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण प्रदूषण ही कहा जाएगा।यह प्रदूषण,जल-प्रदूषण,वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण के रूप में हो सकता है।

Qus-पर्यावरण का क्या अर्थ है?

Ans- पर्यावरण शब्द दो शब्दों अर्थात ‘परी’ तथा आवरण के संयोग या मेल से बना है।’परी’ का अर्थ है ‘चारो ओर’ तथा आवरण का अर्थ है ‘घेरा’ | इस प्रकार पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ हुवा ‘चारो ओर घेरा’ इस प्रकार व्यक्ति के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि व्यक्ति के चारो और जो प्राकृतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियां और परिस्थितियाँ विद्ममान है, इनके प्रभावी रूप को ही पर्यावरण कहा जाता है।

पर्यावरण का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। पर्यावरण इन समस्त शक्तियो, वस्तुओ और दशाओं का योग है जो मानव को चारों और से आवृत किये हुए है। मानव से लेकर वनस्पति तथा सुक्षम जीव तक सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग है।पर्यावरण उन सभी बाहा दशाओं एवं प्रभावों का योग है जो के कार्य-कलापों एवं जीवन का प्रभावित करता है। मानव-जीवन पर्यावरण से घनिष्ठ रूप से सम्बन्ध है।

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